Friday, 5 May 2017

आदिवासी ‘युवाओं और बच्चों’ के लिए ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ नाट्य कार्यशाला

चिखलवाड़ी, त्र्यम्बकेश्वर , नासिक  ‘बेचने और खरीदने’ के मन्त्र से चलने वाले इस ‘मुनाफ़ाखोर’ भूमण्डलीकरण के दौर में मानव ने अपने ‘लालच’ की भूख को मिटाने के लिए ‘अंधाधुंध’ विकास के भ्रमजाल से अपने लिए सबसे बड़ा ‘पर्यावरण’ संकट खड़ा किया है . पृथ्वी ‘मानव’ की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधनों से लैस है, पर उसकी ‘लालच’ को पूरा करने के लिए उसके संसाधन ‘सीमित’ हैं . आज के आधुनिक कहलाने वाले पढे लिखे ‘अनपढ़’ समाज की जीवन शैली की दिशा ‘बाजारवाद’ तय करता है . ‘बाजारवाद’ की ‘लूट’ को विज्ञापन एक ‘लुभावन’ सपने के रूप में समाज को परोसता है . विज्ञापन के ‘मुनाफ़ाखोर’ जुमले ‘YOU do not need it, but you want to have it’ समाज का ‘कुतर्क’ मानस तैयार कर रहे हैं जो ‘ज़रूरत’ की निरर्थकता और ‘लालच’ की सार्थकता स्थापित कर रहा है और ऐसे विज्ञापन के ‘जुमले’ लिखने वाले मीडिया में ‘पर्यावरण’ बचाने की गुहार लगाते हैं . 

मीडिया में वो ’फ़िल्मी एक्टर ’ बिजली और पानी बचाने की अपील करता हुआ दिखता है जिसके ‘घर’ में सबसे ज्यादा ‘बिजली और पानी’ खर्च होता है .स्मार्ट फ़ोन पर busy बेरोज़गार ‘युवा’ झूठे संदेश को भेजने और ‘क्रिकेट’ में बाहुबली की चर्चा करने में व्यस्त है .. धरती माँ का बुखार हर पल बढ़ रहा है ..धरती संकट में है ... मध्यमवर्ग के ‘विकास’ के लिए ‘जंगल’ धड़ाधड़ काटे जा रहे हैं ... देश में सूखा चरम पर है ..किसान का हाल सब ‘विकास’ के अंधों के सामने है ... 

ऐसी हालत में रंगचिन्तक मंजुल भारद्वाज और ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ नाट्यसिद्धांत के अभ्यासक रंगकर्मी अश्विनी नांदेडकर , कोमल खामकर , तुषार म्हस्के 7 -10 मई 2017 तक वैतारना झील के परिसर में बसे ‘चिखलवाडी’ आदिवासी गाँव में ‘आदिवासी युवाओं और बच्चों’ के लिए 4 दिवसीय ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस – हमारा जीवन सुन्दर है !’ नाट्य कार्यशाला को उत्प्रेरित करेगें . इस कार्यशाला में सहभागी ‘पर्यावरण संरक्षण और संतुलन’ पर अपनी नाट्य प्रस्तुतियां करेगें . 

1992 से “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” ने जीवन को नाटक से जोड़कर रंग चेतना का उदय करके उसे ‘जन’ से जोड़ा है। विगत 25 वर्षों से “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” ने अपनी नाट्य कार्यशालाओं में सहभागियों को मंच,नाटक और जीवन का संबंध,नाट्य लेखन,अभिनय, निर्देशन,समीक्षा,नेपथ्य,रंगशिल्प,रंगभूषा आदि विभिन्न रंग आयामों पर प्रशिक्षित किया है और कलात्मक क्षमता को दैवीय वरदान से हटाकर कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण की तरफ मोड़ा है।मनुष्य से मनुष्यता,प्रकृति से उसके संसाधनों को छीनने वाला भूमंडलीकरण विषमता और अन्याय का वाहक है.हवा,जल,जंगल और मानवीयता की बर्बादी पर टिकी है इसके विकास की बुनियाद जिससे पृथ्वी का बुखार बढ़ रहा है . ऐसे समय में लोकतान्त्रिक व्यवस्था की आवाज़ ‘मीडिया’ भी पूंजीवादियों की गोद में बैठकर मुनाफ़ा कमा रहा है तो थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करता हैं बल्कि राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करता है ।भूमंडलीकरण ने दुनिया की जैविक और भौगोलिक विविधता को बर्बाद किया है और कर रहा है.इसका चेहरा बहुत विद्रूप है.इस विद्रूपता के खिलाफ नाटक “बी-७” से “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” ने अपनी वैश्विक हुंकार भरी और सन 2000 में जर्मनी में इसके प्रयोग किये. मानवता और प्रकृति के नैसर्गिक संसाधनो के निजीकरण के खिलाफ सन 2013 में नाटक “ड्राप बाय ड्राप :वाटर” का यूरोप में मंचन किया.नाटक पानी के निजीकरण का भारत में ही नहीं दुनिया के किसी भी हिस्से में विरोध करता है.पानी ‘हमारा नैसर्गिक और जन्मसिद्ध अधिकार है” निजीकरण के लिए अंधे हो चले सरकारी तन्त्र को समझना होगा की जो सरकार अपने नागरिकों को पीने का पानी भी मुहैया ना करा सके वो संस्कार,संस्कृति की दुहाई और विकास का खोखला जुमला बंद करे. आदिवासी सदियों से ‘जल,जंगल और पर्यावरण’ के संतुलन और संरक्षण का प्रहरी रहा है . 

सर्वहारा सांस्कृतिक केंद्र द्वारा युवा रंगकर्मी राकेश नाईक की स्मृति में आयोजित इस कार्यशाला में नाटक के माध्यम से इस अवधारणा को पुनर्स्थापित किया जाएगा कि बिकाऊ फ़िल्मी लोगों की बजाए ‘आदिवासी’ पर्यावरण’ के संतुलन और संरक्षण का ‘सच्चा और टिकाऊ दूत’ है !

reference:- http://iptanama.blogspot.in/2017/05/blog-post_97.html

Tuesday, 2 May 2017

मानवाच्या शरीराच्या वेग – वेगळ्या आकारात घडणारे कलात्मक नाटक ...तुषार म्हस्के


शरीराचा योग्य उपयोग आपल्या कलेच्या माध्यमातून दाखवण्यासाठी थियेटर ऑफ रेलेवंस प्रतीबद्ध आहे . १९९२ पासून सुरुवात झालेला कलात्मक क्रांतीचा आंदोलन समाजात परिवर्तन करत आहे .
हे दृश्य प्रभावी पणे माणसाच्या हृदयाला भिडणारे आपला विचार हा कृतीच्या माध्यमातून नाट्य रूपाने मंचावर मांडताना दिसते आणि  त्यावेळी मनात कुतूहलाची थाप पडते ...

आम्ही नाटकात शरीराचा उपयोग नैपथ्य म्हणून करतो मानवी कलांनी सजलेली कलाकाराची आकृती नैपथ्य म्हणून दिसते ..मानवाच्या शरीराचे आकार हे अगदी सहजपणे आपला विचार दाखवत असतात ....
कलाकार मंचावर भूमिकेमध्ये प्रवेश करतो ...त्यावेळी तो आपल्या आकारातून आपला विचार पोहोचवतो ....नाटकामध्ये दृश्य एकदम मनाला भिडणारे वाटत असतात ...नदीच्या पात्रातील दगड दाखवायचे झाले तरी ...ते मंचावर आल्यानंतर दगडाच्या भूमिकेत आणि प्रेक्षकही  ते समजून जातात  कि हे दगड आहेत ... नाटकामध्ये  नदीचा दृश्य आल्यानंतर खरोखरच नदी वाहत असल्याची जाणीव नाटक पाहत असताना होत असते ...


आणि प्रेक्षक स्वतःला त्या नदीच्या किनारी बसलेला पाहत असतो ..थियेटर ऑफ रेलेवंस नाट्य सिद्धांतामध्ये तयार झालेली नाटके ही प्रेक्षकांच्या मनाला भिडणारी जाणवतात ...कारण , नाटकामध्ये विचार असतात ...त्याच बरोबर दृश्य रचना ...कलाकाराला आपली कलाकृती सादर करण्यासाठी उन्मुक्ततेने आपल्या शरीराचा उपयोग करुन  केलेला उन्मुक्त प्रवास आणि त्याचं सादरीकरण पाहयला मिळत ...



कलाकार भूमिकेतील विचाराना पकडतो आणि आपली भूमिका सादर करत असतो ... दृश्य रचनेमध्ये गाव दाखवायचं झाल तर ते गाव डोळ्याना दिसत ...गावात असणारे घरे ...झाडे , पक्षी , रस्ता आणि डोंगर आणि त्या गावात काम करणारी माणसे हि ,दृश्य रचनेत बोलू लागतात ...शहरांच्या  दृश्या मध्ये हि , आपल्या भूमिकेमध्ये असणारे कलाकार आपल्या शरीराच्या विविध आकाराने तयार केलेली आकृती हुबेहूब दाखवतात ... 



रंगचिंतक - मंजुळ भारद्वाज द्वारा लिखित आणि दिग्दर्शित नाटक म्हणजे एक क्रांती आहे . जी १९९२ पासून सुरु झाली आणि थियेटर ऑफ रेलेवंस सिद्धांत म्हणून जग प्रसिद्ध आहे ...जे नाविन्यासाठी प्रतिबद्ध आहे ....












रंगकर्मी
तुषार म्हस्के


Saturday, 29 April 2017

मेरे होने का वजूद आज यह हवाएँ दे रही हैं !...तुषार म्हस्के

मेरे होने का वजूद आज यह हवाएँ दे रही हैं ना मिट पाई यह मेरे होने की आवाज 
आज यह गूंज रही हैं इन वादियोंमें 
किया था वह रंगकर्म आज उसकी ध्वनि सुनाई दे रही हैं 
क्या जोश था वह ...?
क्या तड़प थी वह ....?
क्या जुनून था वह ....?


ना भूक थी , ना प्यास थी 
बस आपने आप को निर्माण करने की वह जिद्द थी 
गिरता रहा , 
चलता रहा ,
बस आपने आप को मैं खोजता रहा..
बस , तनहाई मिली...
तनहाई की जीवन रेखा में आशा की किरण सामने आई...
सपना रंगकर्म का लिए निकल पड़ा मैं ...
साबित करने मैं आपने आप को ...
साबित करने इस दुनिया को ...
दौड़ पड़ा मैं अपने आत्मा के साथ ...
विचार ,शरीर और मन की कसौटी लिए ...
अपने जीवन को सार्थक बनाने ...
अपना मुखवटा उतारकर ....
कला के साधना की और ...
आज उसकी वह गूंज मुझे वापस सुनाई देने लगीं है 
आपने वजूद के साथ !
____________________________

रंगकर्मी
तुषार म्हस्के
tmhaske09@gmail.com
9029333147

Thursday, 13 April 2017

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस :- “राजनीति’ विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव -3

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस
“राजनीति’
‘खेती, किसान,आत्महत्या और डिजिटल इंडिया’
‘अपनी ही ‘खोपड़ी’ लिए खड़ा भारतीय ‘किसान’ और महान भारत का ‘जनमानस’ खामोश क्यों?’
विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव -3
उत्प्रेरक – रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज
कब : 23 - 27 अप्रैल,2017
कहाँ : युसूफ मेहरअली सेंटर , पनवेल ( मुंबई)
सहभागी : वो सभी देशवासी जो स्वयं को लोकतंत्र का पैरोकार और रखवाले समझते और मानते हैं


विवरण :-
हमारा जीवन हर पल ‘राजनीति’ से प्रभावित और संचालित होता है पर एक ‘सभ्य’ नागरिक होने के नाते हम केवल अपने ‘मत का दान’ कर अपनी राजनैतिक भूमिका से मुक्त हो जाते हैं और हर पल ‘राजनीति’ को कोसते हैं ...और अपना ‘मानस’ बना बैठे हैं की राजनीति ‘गंदी’ है ..कीचड़ है ...हम सभ्य हैं ‘राजनीति हमारा कार्य नहीं है ... जब जनता ईमानदार हो तो उस देश की लोकतान्त्रिक ‘राजनैतिक’ व्यवस्था कैसे भ्रष्ट हो सकती है ? .... आओ अब ज़रा सोचें की क्या बिना ‘राजनैतिक’ प्रकिया के विश्व का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ चल सकता है ... नहीं चल सकता ... और जब ‘सभ्य’ नागरिक उसे नहीं चलायेंगें तो ... बूरे लोग सत्ता पर काबिज़ हो जायेगें ...और वही हो रहा है ... आओ ‘एक पल विचार करें ... की क्या वाकई राजनीति ‘गंदी’ है ..या हम उसमें सहभाग नहीं लेकर उसे ‘गंदा’ बना रहे हैं ... 23 - 27 अप्रैल,2017 को “राजनीति’ विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव 3 का आयोजन कर हमने एक सकारात्मक पहल की है .रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज की उत्प्रेरणा में सभी सहभागी उपरोक्त प्रश्नों पर मंथन करेगें . हम सब अपेक्षा करते हैं की ‘गांधी , भगत सिंह , सावित्री और लक्ष्मी बाई’ इस देश में पैदा तो हों पर मेरे घर में नहीं ... ‘खेती, किसान,आत्महत्या और डिजिटल इंडिया’

‘अपनी ही ‘खोपड़ी’ लिए खड़ा भारतीय ‘किसान’ और महान भारत का ‘जनमानस’ खामोश क्यों?... आओ इस पर मनन करें और ‘राजनैतिक व्यवस्था’ को शुद्ध और सार्थक बनाएं ! आपकी सहभागिता के प्रतीक्षारत !

Tuesday, 28 March 2017

Awaaz Maharashtracha | gudipadwa special

आजचा 'आवाज' वेगळा होता. 
तो खरंच आतला आवाज होता. 

अंधेरीवरुन आल्यानंतर तर तो फारच आतला वाटला. 
या सभोवतालच्या कोलाहलात ऐकूच येत नाही आपलाच आवाज आपल्याला. 
अशावेळी मंजुल भारद्वाज नावाचा एक रंगकर्मी तो आवाज सशक्त करत नवा नाट्यानुभव देतो. सगळी माध्यमं लोकांच्या हातून हिसकावून घेतली
जात असताना आणि 'लोकांची' या नावाखाली, बाजाराची माध्यमं उभी राहात असताना मंजुल भेटतात. ते लोकांच्या हातात नाटक देतात. मग ते आपलं, अगदी आतलं माध्यम आहे, असं वाटायला लागतं. तंत्रज्ञानानं अभिव्यक्तीला बाहुपाशात घेतलं आहे आणि बाजारानं तंत्रज्ञान काबीज केलेलं आहे. अशावेळी हे नाटक बंड करतं व्यवस्थेविरुद्ध, स्वतःविरुद्ध... नि मुख्य म्हणजे, ते बंड करतं कलेच्या प्रस्थापित धारणेविरुद्धही. काही मतभेद असले तरी मला ही मांडणी महत्त्वाची वाटते. 
'थिएटर ऑफ रेलेव्हन्स'ची मांडणी करणारे मंजुल भारद्वाज आणि त्यांच्या टीमचं सादरीकरण असं सारं आज जमून आलं. गुढीपाडव्याच्या निमित्तानं नवतेचं हे नाटक समोर आलं. अश्विनी नि कोमलच्या आवाजानं आमची न्यूजरुम हादरली. तुषार नि सायली यांनी ग्रेट अनुभव दिला. आणि, योगिनीविषयी Yogini Chouk काय सांगावं! तिच्यामुळंच तर हे सारं जमून आलं. एरव्ही, हा 'अनहद नाद' असा स्टुडिओत लाइव्ह पकडणं सोपं थोडंच आहे!
रिपिट आता रात्री १२ वाजता. 
मी इथेच खाली व्हिडिओ लिंकही दिलीय.


Awaaz Maharashtracha | gudipadwa special
https://www.facebook.com/SaamTV/videos/1326075247469971/




संजय आवटे 

Wednesday, 15 March 2017

खरेदी आणि विक्री च्या पाश्चिमात्य बाजारीकरणात ..

खरेदी आणि विक्री च्या पाश्चिमात्य बाजारीकरणात ...देशाची अध्यात्मिक धरोहर पतंजली च्या नावाने संपवली ...बाजारीकरणाचा उदोह ..उदोह ...करून योग दिवसातून करोडोंचा व्यापार चीनी कंपनी ला दिला ... ऐन दिवाळीत मात्र चीनी वस्तू खरेदी करायच्या नाहीत हा ...देशभक्तीचा नारा आपण आम्हाला दिलात ....देशभक्तीच्या नावाने संपूर्ण देश दिवस रात्र नारा लावून रांगेत उभा राहिला ....रांगेत उभा राहून मरणारा हा सामान्य होता ...त्याच वेळी अंबानी चा जीओ ने डिजिटल इंडिया ची कस पकडली ...त्यात फक्त काळ्याचा सफेद हा धन अंबानी चा झाला ...जिओ फुकट वाटूनही फायदा भांडवलदाराचा झाला ...सर्व नियम वेशीवर टाकलेत पण , कालाधन स्वीस बँकेतून काही आला नाही मात्र गरीबाच्या घरातून पैसा बाहेर निघाला ...जन- धन खाते ...संपत्तीने भरून निघाले ...रातोरात देश श्रीमंत झाला ...५०० करोड रुपयांचे लग्न हि त्या काळात झाले ...गरीबा च्या मुली मात्र हळद लावून रांगेत उभ्या राहिल्या ..राजकीय पक्ष मात्र त्यातून वाचले गेले ..आणि चोर ठरला तो सामान्य माणूस ...दारू पिणाऱ्या नवरया पासून बायकोने पैसे मुलांसाठी वाचून ठेवले पण , तुमच्या नोट बंदी ने ,त्याच पैशाच्या नावाने लातेचे बुक्के  तिच्या कंबरर्ड्यात पडले ...मिळाली नाही शांती ...नाही मिळाले समाधान ...हिंसा ...हिसा ...सर्वीकडे दिसू लागली ५० दिवसाचा हिशोब काही मिळाला नाही ...मात्र ५० वर्षांचा हिशोब मागण्याची वेळ आली ...बोलेल तो देशद्रोही  ...या ब्रीद वाक्याने सर्व नेते , समाजसेवक ,सर्व पक्ष मात्र चूप चाप तोंडाला टाळा लावून बसले ....इथेच हा खेळ संपला नाही ...सत्व हे खादी  ने विकले ...तत्वांचा काही खेळ नाही ...इथे फक्त brand ..brand दिसायला लागले ...देशाच्या विकासात सर्व काही माफ आहे ...तत्व आणि सत्व सोडा इथे फक्त खरेदी - विक्रीचा जमाना आहे ...इथे मुंबई - शांगाई होणार बनारस - क्योटो ...पण, असं नाही होणार मुंबई ला मुंबई आणि बनारस ला बनारस च आदर्श मोडल ...आमच्या देशात सर्व काही महान आहे ...कारण , आमचा देश विविधतेने नटलेला आहे ....देशाची सांस्कृतिक धरोहर चा वापर फक्त आणि फक्त स्वः हितासाठी होताना दिसत आहे ...शेतकऱ्यांच्या नावाने निघालेल बजेट...नोटबंदी वर येऊन संपलेला आहे ...कागदावर पैसे शेतकर्यांना मिळाले ...मात्र ते नोटबंदी मध्ये लुप्त होऊन ....तुमच्या या पारदर्शकतेच्या राजकरणात स्वतः ला मतदान करून सुद्धा त्याठिकाणी ० मतदान झाले याच्यातून तुमचे गुण जनतेसमोर दिसण्यात आले ...भक्तांच्या मनात फक्त  ' व्यक्तीवाद ' मरणारा हा आपलाच आहे ....आणि बदलणारी व्यवस्था हि आपलीच आहे ....पण, भक्ती महान यात अडकलेली जनता मात्र सत्त्याला नाकारून भक्ती मध्ये तल्लीन आहे ...प्रभू तुम्ही महान आहात .. तुम्हीच आमचे हिंदुत्वाचे नेतृत्व ...आंधळी भक्ती - आंधळी श्रद्धा , त्रास सर्वाना होतोय ..बोलणार कोण कारण , हिंदूत्व धोक्यात आहे ...राम मंदीर काही बनल नाही मात्र ..राम -मंदीर स्थानक जरूर बनले ...हिंदुत्वाची साद तिकडेच संपते ...ना काही मंदीर बनत ..ना तिकडे राम विराजमान होत ...आम्ही सामान्य भक्त ....प्रभू तुम्ही बोलाल ते सत्य ...आम्ही सर्व आपले पामर आहोत ...अशी हि मानसिकता ...ह्काच्या लढाईत हक्क सोडून भावनांच राजकारण केलं म्हणजे हे आप - आपसात भांडत बसतील तिकडे विजय माल्या चा कर्ज माफ होईल ...आणि सामान्य जनता प्रत्येक ४ व्यवहारांवर नगद  आवक - जावक कर भरेल ...कारण आमच्या देशात आता विदेशी brand दिसायला लागलेत ...या भक्ताचा काही नेम नाही ...अरे , बाबा sponser होते ना या इलेक्शन च्या मागे , मग नोटबंदी केली तर काय फरक पडतोय ...बघ , मित्रा काय आहे ....तुझा ठीक आहे ज्यांनी पैसा लावला त्यांना पैसा नको का मिळायला , मला तर वाटत हे सर्व योग्यचं आहे ...अशा वेळी बनलेल्या brand नेत्याची प्रतिमा फक्त बघून घेणारी वाटते ...छत्रपतींचा आशीर्वाद ..आणि मोदींची साथ ...इलेक्शन अगोदर छत्रपती दिसले आणि सत्ता आल्यानंतर कुठे गेले ..तुमचे brand काय इथे चालला नाही का ?...विकासाच्या परिणीती मध्ये कॉंग्रेस चे अजेंडे पूर्ण होत असताना दिसत आहेत ...आणि कॉंग्रेस मुक्त भारत घडवणार प्रश्नच आहे ...brand साहेब .....

रंगकर्मी 
तुषार म्हस्के

Tuesday, 14 March 2017

“राजनीति’ विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव -2

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस
“राजनीति’ 
विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव -2
उत्प्रेरक – रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज
कब : 17 -21 मार्च , 2017
कहाँ : शांतिवन , पनवेल ( मुंबई)
सहभागी : वो सभी देशवासी जो स्वयं को लोकतंत्र का पैरोकार और रखवाले समझते और मानते हैं 
विवरण

हमारा जीवन हर पल ‘राजनीति’ से प्रभावित और संचालित होता है पर एक ‘सभ्य’ नागरिक होने के नाते हम केवल अपने ‘मत का दान’ कर अपनी राजनैतिक भूमिका से मुक्त हो जाते हैं और हर पल ‘राजनीति’ को कोसते हैं ...और अपना ‘मानस’ बना बैठे हैं की राजनीति ‘गंदी’ है ..कीचड़ है ...हम सभ्य हैं ‘राजनीति हमारा कार्य नहीं है ... जब जनता ईमानदार हो तो उस देश की लोकतान्त्रिक ‘राजनैतिक’ व्यवस्था कैसे भ्रष्ट हो सकती है ? .... आओ अब ज़रा सोचें की क्या बिना ‘राजनैतिक’ प्रकिया के विश्व का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ चल सकता है ... नहीं चल सकता ... और जब ‘सभ्य’ नागरिक उसे नहीं चलायेंगें तो ... बूरे लोग सत्ता पर काबिज़ हो जायेगें ...और वही हो रहा है ... आओ ‘एक पल विचार करें ... की क्या वाकई राजनीति ‘गंदी’ है ..या हम उसमें सहभाग नहीं लेकर उसे ‘गंदा’ बना रहे हैं ... 17 -21 मार्च, 2017 को “राजनीति’ विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव 2 का आयोजन कर हमने एक सकारात्मक पहल की है .रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज की उत्प्रेरणा में सभी सहभागी उपरोक्त प्रश्नों पर मंथन करेगें . हम सब अपेक्षा करते हैं की ‘गांधी , भगत सिंह , सावित्री और लक्ष्मी बाई’ इस देश में पैदा तो हों पर मेरे घर में नहीं ... आओ इस पर मनन करें और ‘राजनैतिक व्यवस्था’ को शुद्ध और सार्थक बनाएं ! आपकी सहभागिता के प्रतीक्षारत !