Friday, 31 July 2015

शोध

हा शोध ,
अंतर्मनातील विचारांचा,

झाडावरील वेगवेगळ्या आकारांच्या पानांचा, 
त्यातही लपलेल्या हिरव्या,
पिवळ्या आणि पोपटी रंगांचा, 
श्वास घेवून निर्णय घेण्याचा, 

सतत नदीप्रमाणे प्रवाहित राहण्याचा ,
नयनांना फुलवण्याचा ,
कळत - नकळत ला पकडण्याचा, 
सोबत राहून आकाशात संचार करण्याचा, 
क्षणा क्षणाला कोकीळाचा आवाज ऐकण्याचा, 
बनवलेले मापदंड तोडण्याचा ,
मनातील कोलंबसला जिवंत ठेवण्याचा,

सतत प्रवाहाबरोबर माझा 'शोध घेण्याचा, 

तुषार म्हस्के 

Thursday, 9 July 2015

यही मेरा मजहब है....

ना मै हिन्दू हूँ
ना मै मुसलमान....
ना मै सिख हूँ 
ना मैं ईसाई ....
नाही मेरा कोई मजहब है....
ना मैं कोई मजहब का हूँ....
मै खुले आसमान मेँ उड़ने वाला पंछी हूँ....
गगन में संचार करना मेरा जीवन है...
आँखों में तारे बसाना मेरी ताकत है....
दिलों को छुना मुझे अच्छा लगता है...
विचारोंको बनाना मेरी फितरत है....
मै अपने साथ ....
मेरा झंडा कोनसे रंग का नहीं है....
मेरी कफ़न इद्र्धनुष्य ने बांदी है....
आसमान को देखता हूँ...
जमीन पर सोता हूँ....
मैं मनुष्य हूँ....
और मनुष्य बनकर जीना ही मेरा जीवन है.....
इंसानियत मेरा धर्म है....
 यही मेरा मजहब है....

तुषार म्हस्के

Saturday, 20 June 2015

Tuesday, 26 May 2015

Glimpse of play “अनहद नाद – Unheard Sounds of Universe”.
























दि एक्सपेरिमेंटल थिएटर फाउंडेशन 29 मई,2015 को शाम 4.30 बजे प्रसिद्ध रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित और निर्देशित बहुभाषिक नाटक “ अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स ” का मिनी थिएटर,रवीन्द्र नाट्यमंदीर, प्रभादेवी( दादर) मुंबई में प्रथम मंचन कर रही है .
नाटक “अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स ” कलात्मक चिंतन है, जो कला और कलाकारों की कलात्मक आवश्यकताओं,कलात्मक मौलिक प्रक्रियाओं को समझने और खंगोलने की प्रक्रिया है। क्योंकि कला उत्पाद और कलाकार उत्पादक नहीं है और जीवन नफा और नुकसान की बैलेंस शीट नहीं है इसलिए यह नाटक कला और कलाकार को उत्पाद और उत्पादिकरण से उन्मुक्त करते हुए, उनकी सकारात्मक,सृजनात्मक और कलात्मक उर्जा से बेहतर और सुंदर विश्व बनाने के लिए प्रेरित और प्रतिबद्ध करता है ।
अश्विनी नांदेडकर ,योगिनी चौक, संदेश,सायली पावसकर,तुषार म्हस्के, वैशाली भोसले, कोमल खामकर और अमित डियोंडी अपने अभिनय से नाट्य पाठ को मंच पर आकार देकर साकार करेंगें !
एक्सपेरिमेंटल थिएटर फाउंडेशन विगत २३ वर्षों से देश विदेश में अपनी प्रोयोगात्मक , सार्थक और प्रतिबद्ध प्रस्तुतियों के लिए विख्यात है .
The Experimental Theatre Foundation is premiering renowned playwright & director Manjul Bhardwaj `s multilingual play “अनहद नाद –Unheard Sounds of Universe” on 29 May, 2015, 4.30 PM at Mini Theatre, Ravindra Natya Mandir (Dadar-west), Mumbai. The play “unheard sounds of Universe” is an exploration of artistic needs to emanicapte art and artists from productization to comiit their artistic creativity to make the world better and humane and not a profit and loss balance sheet of life . Ashwini Nandedkar,Yogini Chouk, Sandesh,Sayali Pawaskar,Tushar Mhaske,Vaishali Bhosale, Komal Khamkar and Amit Diondyi are performing in the play.
Experimental Theatre Foundation is known nationally & internationally for it`s experimental, relevant and committed performance since 1992.




Tuesday, 12 May 2015

इप्टानामा: अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ यूनिवर्स

इप्टानामा: अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ यूनिवर्स: मुंबई। दि एक्सपेरिमेंटल थिएटर फाउंडेशन 29 मई,2015 को शाम 4.30 बजे प्रसिद्ध रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित और निर्देशित बहुभाषिक न...

Thursday, 30 April 2015

कुदरत के करिश्मे

                                                                                                   Click by Manjul Bhardwaj


कुदरत के करिश्मे 
उसके आकार 
उसके दृश्य
उसका चैतन्य
उसका दृष्टिकोण 
उसके प्रवाह 
उसकी एक फ्रेम बनी 
बादल हवा मैं तैर रहे है 
सूरज चुपके से देख रहा है
पहाड़ आपनी शान में खड़े है
वहीँ पहाडोने हरे कपडे पहने है
पंछी बाते कर रहे है 
सॄजना का माहोल बना है 
सब में प्रसन्नता छायी हुई है
सब perform कर रहे है अपने व्यवहार में
ले रहे है सांस जीवन के जीने में
जिंदगी में उन्मकुत होने की
सुन रहे है एक दूसरे को
समज रहे है अपने को 
सुनके सुनना और जीवन में उसे respons करना 
यही तो है सुनी आवाजें 
जिसको हमने अनसुना किया था ....unheard....

एक सूर्य ......


एक सूर्य उसके बहुत से रूप
सुबह आता है तो बहुत ही प्यारा दिखता
धीरे धीरे उसकी व्यापकता बढ़ जाती है
फिर दोपहर को हम उसे देख नहीं सकते
अपना रूप बदल देता है
शाम को धीरे धीरे वापस वह दिखाई देता है
हमारी आँखे उसे देख पाती है
आज बहुत ही प्रसन्न दिखने लगा
 पुरे दिन भर perform करके आया
हस्ते हस्ते सफेद होगया
धीरे धीरे लाल होने लगा
शांत था परमानंद की कसौटी पर दिखने लगा था
सोच लिया इसको आँखों में बिठाना है
इसको ऐसे ही मेरे अपने ब्रम्हांड में जलाये रखना है
उसको जाके पकड़ा और दिल में समा लिया
मेरी मुद्राए बदलने लगी आँखे स्थिर होगयी
और शांति से आजूबाजू देखने लगा
पंछी बाते करने लगे,
हवाएँ स्पर्श करने लगी,
चाँद पिछेसे देखने लगा ,
समुन्दर खिलने लगा,
एक सुकून भरी साँस लेकर मैं अपने कलात्मक साधना की और चलने लगा.....