Saturday, 15 July 2017

मैं जुनूनी हूँ , क्योंकि जुनून मेरे सर पर सवार है !...

" मैं जुनूनी हूँ , क्योंकि जुनून मेरे सर पर सवार है ! I am mad but I am alive... yes I admit I am mad but alive.. Yes choice is ours to be mad .."


रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित आणि दिग्दर्शित "अनहद नाद - Unheard Sounds of Universe " या बहुभाषिक नाटका मधील हा सवांद .... जुनून हा ध्येयाच्या दिशेने असावा ...आपल्या समोर ध्येय ठेवून त्या ध्येयाच्या दिशेने वाटचाल करणे म्हणजेच त्या ध्येयासाठी दिलेली कुर्बानी ...



आणि त्या कुर्बानीचे मोल म्हणजेच पिढ्यानू पिढ्या तो व्यक्ति ' विचार ' रूपाने जिवंत राहतो ...भगत सिंग हा असाच ध्येय वेडा तरुण होता ...आणि तो आज विचार म्हणून जिवंत आहे ...मेल्यानंतरही .
ध्येयाला साध्य केल्यानंतर या पावसात भिजण्याची मज्जा खूप वेगळी आहे. ही जाणीव अनहद नाद चा performance झाल्यानंतर मला झाली.



आकाशातून पडणाऱ्या पावसाचे थेंब अगदी कपाळावर पडू लागले आणि आम्ही कलाकार गोलाकार उभे राहून डोळे बंद करून या सृजनात्मक क्षणाला जगू लागलो .एक कलाकार म्हणून स्वतःमध्ये अभिमान निर्माण झाला ...या माझ्या अंतकरणातील विश्वाला जिंकण्याचे समाधान आणि सुख मला मिळू लागले. डोळे बंद करून " हम हैं " चा आवाज आकाशाच्या दिशेने सोडला ...त्याचा वेग इतका होता की पाऊस जोर-जोरात पडू लागला ...वाटलं , काय आहे क्षण हा !!!!-..पाऊसात तर सर्व जण भिजतात आणि एक विचार घेऊन या पाऊसात भिजण्याचा आनंद केवढा मोठा आहे हे मला आज समजले ... कारण , यावेळी माझ्या मधील न्यूनगंड तोडून अनहद नाद - या जीवन प्रेरित नाटकातील नवीन संवाद पहिल्यांदा परफॉर्म करण्याचं समाधान आज मला मिळाले ...



थिएटर ऑफ रेलेवन्स ची हि प्रयोगशील प्रक्रिया, रंगभूमी ला वैचारिक रंगभूमी बनवण्यासाठी वैचारिक प्रयोग करत आहे ...

तुषार म्हस्के
थिएटर ऑफ रेलेवन्स कार्यशाळा
शांतीवन, पनवेल , मुंबई
दिनांक 10 ते 14 जुलै 2017.

Wednesday, 5 July 2017

रंगमंच: ‘राजगति’ ने बदली मेरी राजनैतिक अवधारणा – केशव


“हमेशा से ही सुनता आया था कि राजनीति बहुत गन्दी है, एक गटर की तरह है। आस पास के माहौल को हमेशा राजनीति के ख़िलाफ़ ही पाया था। 2011 में अन्ना आंदोलन और फिर आप के गठन के दौरान लगने लगा था कि इसे साफ़ किया जा सकता है, पर फिर कुछ समय के बाद ये लगने लगा कि ये सच में बहुत गन्दी है और अच्छे से अच्छे व्यक्ति को भी बिगाड़ देती है।

राजनीति का इतिहास ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जो राजनीति में ईमानदारी पूर्वक संघर्ष करके आए मगर बाद में पथभ्रष्ट हो गए। जिससे यही लगने लगा की राजनीति में ही कोई बुराई है जो लोगों को भ्रष्ट कर देती है। जब मैंने रंगचिन्तक मंजुल भारद्वाज लिखित एवम् निर्देशित और अश्विनी नांदेडकर, कोमल खामकर और तुषार म्हस्के अभिनीत नाटक “राजगति” को देखा, उस पर विचार किया तो ये समझ में आया कि राजनीति बुरी नहीं है, वो तो सत्ता और व्यवस्था के गठजोड़ से उत्पन्न बुराइयां हैं जिन्हें राजनीति के सर पर डाल दिया जाता है।

हमारे राजनेता सत्ता प्राप्त करने के बाद इस व्यवस्था की मदद से राजनीति को बदनाम कर रहे हैं। इस नाटक को देखकर पहली बार मुझे राजनीति की पवित्रता का अनुभव हो रहा था। आम तौर पर समाज में कुछ भी होता है तो लोग बोल देते हैं कि ज़माना खराब है, इलाका खराब है इत्यादि! वो कभी आत्ममंथन नहीं करते हैं कि दरअसल ख़राब तो लोग हैं, खराब तो सामाजिक व्यवस्था है। यही बात राजनीति पर भी लागू होती है। इस नाटक को देखने के बाद राजनीति के प्रति जो मन में एक पूर्वाग्रह था वह टूटा और ये समझ में आया कि अगर व्यवस्था को दुरुस्त कर दिया जाए तो राजनीति की शुद्धता सबको साफ़-साफ़ नजर आने लगेगी।

पर ये भी समझ में आया कि राजनीति को बदलना कोई बच्चों का खेल नहीं है, ये नारेबाजी और भाषणों से नहीं होने वाला, व्यवस्था बहुत ही जटिल और सख़्त है, और इसको बदलने के लिए सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता है। पर इसको बदला जा सकता है और हम इसे बदलेंगे।

दूसरे राजनीतिक नाटकों और राजगति में अंतर-

जहां तक राजनीति के ऊपर लिखे गए नाटकों का सवाल है तो समाजवाद की ओर झुकाव होने के कारण मैंने कुछ लेफ्ट संगठनों के नाटकों को देखा है, उनको आत्मसात किया है। पर अब समझ में आ रहा है कि वे बहुत ही रिजिड हैं, जिस मुद्दे को भी उठाते हैं उसमें बिलकुल कट्टर हो जाते हैं, मुझे भी ये लगने लगा था कि दक्षिणपंथियों की कट्टरता का जबाव कट्टरता से ही दिया जा सकता है, इस कारण मैं भी धार्मिक और राजनीतिक बुराईयों पर चोट करने के बजाये धर्म और राजनीति पर ही चोट करने लगा था, लोगों कि भावनाओं को मैंने महत्त्व देना बंद कर दिया था, बस मैं और मेरी विचारधारा के लोग ही सही हैं ऐसा मानने लगा था पर इस नाटक को देखकर मेरे विचार बदले।

अभी तक मैंने ऐसा कोई नाटक नहीं देखा था जो राजनीति के पवित्रता को सामने लाता हो। नाटक मनोरंजन के द्वारा शिक्षा देने की एक बहुत ही महत्वपूर्ण हथियार है मगर राजनीति पर जो नाटक लिखे गए हैं उन में से अधिकांशतः सिर्फ अपने जैसी विचारधाराओं को मानने वाले लोगों को तुष्ट करने के लिए लिखे गए हैं, वो हमारे मन की रिजीडीटी को और ज्यादा बढ़ाते हैं जबकि राजगति के साथ ऐसा नहीं है। ये हमारे विचारों पर चोट करती है और आत्मचिंतन करने पर बाध्य करती है।

राजनीति पर लिखे गए अधिकतर नाटक नकारात्मक हैं। दरअसल दो तरह की चीजें होती हैं, एक तो युद्ध का विरोध दूसरी शांति का समर्थन! लक्ष्य दोनों का लगभग एक समान होता है मगर एक नकारात्मक है, दूसरी सकारात्मक। पहली बार राजनीति के लिए इतना सकारात्मक नाटक देखने को मिला जिसने मन से कई पूर्वाग्रहों को दूर करते हुए, मन को एक वैचारिक शांति प्रदान किया।
साहित्य में गद्य और पद्य की जो विधा है, उसका प्रयोग भी इसमें अच्छी तरह से हुआ है जहां अधितर नाटक गद्यात्मक शैली में लिखे होने की वजह से कहीं कहीं पर नीरस हो जाते हैं वहीँ ये नाटक शुरू से अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है।

चार दिनों का स्वराज शाला का जो मेरा अनुभव रहा है वो किसी राजनीतिक या गैर राजनीतिक संगठन का अब तक का सबसे अलग और अविस्मरणीय अनुभव है। वहाँ आना, खुद पर लिखना, खुद से बातें करना काफी अलग था। भारतीय शिक्षा पद्धति के प्रति मेरे मन में हमेशा से ही द्वेष रहा है! शिक्षा किस प्रकार से दिया जाए इसका इसका एक बहुत ही बेहतरीन उदाहरण इस स्वराज शाला में देखने को मिला। सुबह का चैतन्य अभ्यास का अनुभव भी काफी अलग था। वैसे तो मैं नवोदय में मैंने PT वगैरह किया था पर ये एक अलग तरह का अनुभव था। हम समाज को जो देना चाहते हैं (धार्मिक सद्भाव, भेदभाव से मुक्ति, लिंग समानता इत्यादि) उसकी सुरुआत खुद हमसे होती है। लोग कहते हैं कि खुद को बदलो तो ज़माना बदल जायेगा इस बात का जीवंत उदाहरण वहाँ देखने को मिला।

सभी राजनीतिक/सामाजिक संगठनों में एक अध्यक्ष होता है और उसी के अनुसार वहां का काम होता है पर यहाँ ऐसा नहीं था। वहां सभी के विचारों का ना सिर्फ़ स्वागत होता था, बल्कि उनके विचारों को खंगाला भी जाता था। युवाओं को प्रेरित किया किया जाता था कि वे अपने अंदर की बात को सामने लाएं। ये बहुत ही बेहतरीन प्रयोग है क्योंकि विचारों के मंथन से ही वो अमृत निकलेगा जो राजनीति और समाज को नया जीवन प्रदान करेगा। मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ कि यहां सही मायनों में लीडर तैयार किए जा रहे हैं।

भावनात्मक तौर पर साथियों का लगाव भी अद्भुत था, पहले पल से ही मुझे ऐसा लगा ही नहीं कि मैं यहाँ पर अजनबी हूँ। जहां अन्य संगठनों में लोग खुद को आगे रखने के होड़ में दूसरों को पीछे खींचते हैं, यहाँ ऐसा नहीं था। यहां एक समग्रता थी, सबको साथ लेकर चलने का भाव था। चार दिनों में आपसी लगाव इतना हो गया था कि आते वक़्त आँखे नम हो रही थीं।

इस स्वराज शाला में मुझे काफी कुछ ऐसा सीखने को मिला है जो बिलकुल नया है, व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया में सहायक है और जीवन को एक नयी दिशा प्रदान करने वाला है।

इन चार दिनों में मेरा खुद से, समाज से, राजनीति से एक नया परिचय हुआ। कहने को तो बहुत कुछ है पर अभी मैं अपने उसी बात के साथ विराम लूंगा कि अन्य राजनीतिक पार्टियां जहां चुनाव लड़ने के बाद जीतती हैं, स्वराज इंडिया अभी से जीत रही है।
धन्यवाद साथियों!
धन्यवाद मंजुल सर!”
केशव


reference :- http://www.biharkhojkhabar.com/%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%9A-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0/

कुरार व्हिलेज मध्ये असणाऱ्या या रिक्षावाल्याना माझा सलाम आहे ....तुषार म्हस्के

रिक्षा वाले म्हटल्यानंतर आता पर्यंत आपल्यासमोर येणारी छबी ही ...अरे रावी आणि उद्धट पणाची आपल्याला दिसते ...महत्वाच्या ठिकाणी पोहचायचं असेल आणि त्यावेळी हे रिक्षा वाले कधीच वेळेत मिळत नाही त्याच्यावरून स्वाभाविक एक नागरिक म्हणून आपली चिडचिड होत असते ...या सर्वांच्या पलीकडे मालाड कुरार व्हिलेज मधील रिक्षावाल्यांनी आपली एक सामाजिक भूमिका ओळखून मालाड पूर्व ...वेस्टर्न एक्स्प्रेस हायवे लगत असणारा लोकल रस्ता जो दफतरी रोड म्हणून प्रख्यात आहे तो रस्ता गेली 12 महिने असाच खड्डे आणि धुळीचा होणारा त्रास रिक्षावले ...सहन करत होते ...इथे फक्त रिक्षावले नाही तर इथे सर्व सामान्य जनतेला होणारा त्रास ...

ट्रॅफिक 1 ते 2 तास तशीच असायची ...त्यामुळे घशाचे होणारे आजार ...आणि हृदयाचे होणारे आजार तर मालाड वासीयांनी अनुभवलेला आहे ...पण, त्याच्यासाठी हा सामान्य वर्ग कधीच तयार झालेला पाहिला नाही ...


रिक्षा वाले ( कुरार मधील त्या मध्ये राईट रिक्षा स्टँड , रमेश रिक्षा स्टँड आणि ओमकार रिक्षा स्टँड ) या रिक्षावाल्यांनी सतत महानगर पालिकेला पत्र देण्यापासून ते स्थानिक नगर सेवक आमदार यांना वारंवार तक्रारी केल्या , त्यामध्ये लेखी तक्रारी या होत्याच ...
परंतु , महानगरपालिका आपल्या सोयीनुसार काम करताना दिसत होती ...रस्त्याची अवस्था तर पावसामुळे अजूनच खराब झाली होती ...रस्त्यावर लावलेले ब्लॉक्स अगदी खराब झालेले होते ...जागो- जागी खड्डे पडलेले ...यांच्यातून रिक्षा मधून प्रवास करताना हालत एकदम खराब होऊन जायची ....
शारीरिक आणि मानसिक अवस्थेत प्रवास करणारे प्रवासी आणि गाड़ी चालक आणि सामान्य नागरिक एकदम त्रासून जायचे ...अशा परिस्थितीत ओमकार , राईट आणि रमेश हॉटेल चे रिक्शा वाले एकत्र आले आणि ...त्यांनी एक पाउल उचलले आणि स्वतःहून है खड्डे बुझवायला सुरुवात केली रिक्शा बाजूला उभी करुन खाकी कलर चे कपड़े आणि यामध्ये उभा असणारा रिक्षावाला आज मी रस्त्यावर काम करताना पाहिला 25 ते 30 रिक्षावले स्वतःसाठी स्वतःच्या पोटासाठी जरी काम करत होते...
 तरीही ते सम्पूर्ण मालाड वासीयांसाठी होणाऱ्या त्रासातून त्यांना बाहेर काढण्यासाठी स्वतः सिमेंट वाळू ...आणि विटांचे तुकडे यांनी खळगे भरत होते ....मुंबई , मालाड ,कुरार व्हिलेज मध्ये असणाऱ्या या रिक्षावाल्याना माझा सलाम आहे ....



तुषार म्हस्के
दिनांक:- 5 जुलै 2017
मालाड ( पूर्व ),मुम्बई.

Friday, 5 May 2017

आदिवासी ‘युवाओं और बच्चों’ के लिए ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ नाट्य कार्यशाला

चिखलवाड़ी, त्र्यम्बकेश्वर , नासिक  ‘बेचने और खरीदने’ के मन्त्र से चलने वाले इस ‘मुनाफ़ाखोर’ भूमण्डलीकरण के दौर में मानव ने अपने ‘लालच’ की भूख को मिटाने के लिए ‘अंधाधुंध’ विकास के भ्रमजाल से अपने लिए सबसे बड़ा ‘पर्यावरण’ संकट खड़ा किया है . पृथ्वी ‘मानव’ की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधनों से लैस है, पर उसकी ‘लालच’ को पूरा करने के लिए उसके संसाधन ‘सीमित’ हैं . आज के आधुनिक कहलाने वाले पढे लिखे ‘अनपढ़’ समाज की जीवन शैली की दिशा ‘बाजारवाद’ तय करता है . ‘बाजारवाद’ की ‘लूट’ को विज्ञापन एक ‘लुभावन’ सपने के रूप में समाज को परोसता है . विज्ञापन के ‘मुनाफ़ाखोर’ जुमले ‘YOU do not need it, but you want to have it’ समाज का ‘कुतर्क’ मानस तैयार कर रहे हैं जो ‘ज़रूरत’ की निरर्थकता और ‘लालच’ की सार्थकता स्थापित कर रहा है और ऐसे विज्ञापन के ‘जुमले’ लिखने वाले मीडिया में ‘पर्यावरण’ बचाने की गुहार लगाते हैं . 

मीडिया में वो ’फ़िल्मी एक्टर ’ बिजली और पानी बचाने की अपील करता हुआ दिखता है जिसके ‘घर’ में सबसे ज्यादा ‘बिजली और पानी’ खर्च होता है .स्मार्ट फ़ोन पर busy बेरोज़गार ‘युवा’ झूठे संदेश को भेजने और ‘क्रिकेट’ में बाहुबली की चर्चा करने में व्यस्त है .. धरती माँ का बुखार हर पल बढ़ रहा है ..धरती संकट में है ... मध्यमवर्ग के ‘विकास’ के लिए ‘जंगल’ धड़ाधड़ काटे जा रहे हैं ... देश में सूखा चरम पर है ..किसान का हाल सब ‘विकास’ के अंधों के सामने है ... 

ऐसी हालत में रंगचिन्तक मंजुल भारद्वाज और ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ नाट्यसिद्धांत के अभ्यासक रंगकर्मी अश्विनी नांदेडकर , कोमल खामकर , तुषार म्हस्के 7 -10 मई 2017 तक वैतारना झील के परिसर में बसे ‘चिखलवाडी’ आदिवासी गाँव में ‘आदिवासी युवाओं और बच्चों’ के लिए 4 दिवसीय ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस – हमारा जीवन सुन्दर है !’ नाट्य कार्यशाला को उत्प्रेरित करेगें . इस कार्यशाला में सहभागी ‘पर्यावरण संरक्षण और संतुलन’ पर अपनी नाट्य प्रस्तुतियां करेगें . 

1992 से “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” ने जीवन को नाटक से जोड़कर रंग चेतना का उदय करके उसे ‘जन’ से जोड़ा है। विगत 25 वर्षों से “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” ने अपनी नाट्य कार्यशालाओं में सहभागियों को मंच,नाटक और जीवन का संबंध,नाट्य लेखन,अभिनय, निर्देशन,समीक्षा,नेपथ्य,रंगशिल्प,रंगभूषा आदि विभिन्न रंग आयामों पर प्रशिक्षित किया है और कलात्मक क्षमता को दैवीय वरदान से हटाकर कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण की तरफ मोड़ा है।मनुष्य से मनुष्यता,प्रकृति से उसके संसाधनों को छीनने वाला भूमंडलीकरण विषमता और अन्याय का वाहक है.हवा,जल,जंगल और मानवीयता की बर्बादी पर टिकी है इसके विकास की बुनियाद जिससे पृथ्वी का बुखार बढ़ रहा है . ऐसे समय में लोकतान्त्रिक व्यवस्था की आवाज़ ‘मीडिया’ भी पूंजीवादियों की गोद में बैठकर मुनाफ़ा कमा रहा है तो थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करता हैं बल्कि राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करता है ।भूमंडलीकरण ने दुनिया की जैविक और भौगोलिक विविधता को बर्बाद किया है और कर रहा है.इसका चेहरा बहुत विद्रूप है.इस विद्रूपता के खिलाफ नाटक “बी-७” से “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” ने अपनी वैश्विक हुंकार भरी और सन 2000 में जर्मनी में इसके प्रयोग किये. मानवता और प्रकृति के नैसर्गिक संसाधनो के निजीकरण के खिलाफ सन 2013 में नाटक “ड्राप बाय ड्राप :वाटर” का यूरोप में मंचन किया.नाटक पानी के निजीकरण का भारत में ही नहीं दुनिया के किसी भी हिस्से में विरोध करता है.पानी ‘हमारा नैसर्गिक और जन्मसिद्ध अधिकार है” निजीकरण के लिए अंधे हो चले सरकारी तन्त्र को समझना होगा की जो सरकार अपने नागरिकों को पीने का पानी भी मुहैया ना करा सके वो संस्कार,संस्कृति की दुहाई और विकास का खोखला जुमला बंद करे. आदिवासी सदियों से ‘जल,जंगल और पर्यावरण’ के संतुलन और संरक्षण का प्रहरी रहा है . 

सर्वहारा सांस्कृतिक केंद्र द्वारा युवा रंगकर्मी राकेश नाईक की स्मृति में आयोजित इस कार्यशाला में नाटक के माध्यम से इस अवधारणा को पुनर्स्थापित किया जाएगा कि बिकाऊ फ़िल्मी लोगों की बजाए ‘आदिवासी’ पर्यावरण’ के संतुलन और संरक्षण का ‘सच्चा और टिकाऊ दूत’ है !

reference:- http://iptanama.blogspot.in/2017/05/blog-post_97.html

Tuesday, 2 May 2017

मानवाच्या शरीराच्या वेग – वेगळ्या आकारात घडणारे कलात्मक नाटक ...तुषार म्हस्के


शरीराचा योग्य उपयोग आपल्या कलेच्या माध्यमातून दाखवण्यासाठी थियेटर ऑफ रेलेवंस प्रतीबद्ध आहे . १९९२ पासून सुरुवात झालेला कलात्मक क्रांतीचा आंदोलन समाजात परिवर्तन करत आहे .
हे दृश्य प्रभावी पणे माणसाच्या हृदयाला भिडणारे आपला विचार हा कृतीच्या माध्यमातून नाट्य रूपाने मंचावर मांडताना दिसते आणि  त्यावेळी मनात कुतूहलाची थाप पडते ...

आम्ही नाटकात शरीराचा उपयोग नैपथ्य म्हणून करतो मानवी कलांनी सजलेली कलाकाराची आकृती नैपथ्य म्हणून दिसते ..मानवाच्या शरीराचे आकार हे अगदी सहजपणे आपला विचार दाखवत असतात ....
कलाकार मंचावर भूमिकेमध्ये प्रवेश करतो ...त्यावेळी तो आपल्या आकारातून आपला विचार पोहोचवतो ....नाटकामध्ये दृश्य एकदम मनाला भिडणारे वाटत असतात ...नदीच्या पात्रातील दगड दाखवायचे झाले तरी ...ते मंचावर आल्यानंतर दगडाच्या भूमिकेत आणि प्रेक्षकही  ते समजून जातात  कि हे दगड आहेत ... नाटकामध्ये  नदीचा दृश्य आल्यानंतर खरोखरच नदी वाहत असल्याची जाणीव नाटक पाहत असताना होत असते ...


आणि प्रेक्षक स्वतःला त्या नदीच्या किनारी बसलेला पाहत असतो ..थियेटर ऑफ रेलेवंस नाट्य सिद्धांतामध्ये तयार झालेली नाटके ही प्रेक्षकांच्या मनाला भिडणारी जाणवतात ...कारण , नाटकामध्ये विचार असतात ...त्याच बरोबर दृश्य रचना ...कलाकाराला आपली कलाकृती सादर करण्यासाठी उन्मुक्ततेने आपल्या शरीराचा उपयोग करुन  केलेला उन्मुक्त प्रवास आणि त्याचं सादरीकरण पाहयला मिळत ...



कलाकार भूमिकेतील विचाराना पकडतो आणि आपली भूमिका सादर करत असतो ... दृश्य रचनेमध्ये गाव दाखवायचं झाल तर ते गाव डोळ्याना दिसत ...गावात असणारे घरे ...झाडे , पक्षी , रस्ता आणि डोंगर आणि त्या गावात काम करणारी माणसे हि ,दृश्य रचनेत बोलू लागतात ...शहरांच्या  दृश्या मध्ये हि , आपल्या भूमिकेमध्ये असणारे कलाकार आपल्या शरीराच्या विविध आकाराने तयार केलेली आकृती हुबेहूब दाखवतात ... 



रंगचिंतक - मंजुळ भारद्वाज द्वारा लिखित आणि दिग्दर्शित नाटक म्हणजे एक क्रांती आहे . जी १९९२ पासून सुरु झाली आणि थियेटर ऑफ रेलेवंस सिद्धांत म्हणून जग प्रसिद्ध आहे ...जे नाविन्यासाठी प्रतिबद्ध आहे ....












रंगकर्मी
तुषार म्हस्के


Saturday, 29 April 2017

मेरे होने का वजूद आज यह हवाएँ दे रही हैं !...तुषार म्हस्के

मेरे होने का वजूद आज यह हवाएँ दे रही हैं ना मिट पाई यह मेरे होने की आवाज 
आज यह गूंज रही हैं इन वादियोंमें 
किया था वह रंगकर्म आज उसकी ध्वनि सुनाई दे रही हैं 
क्या जोश था वह ...?
क्या तड़प थी वह ....?
क्या जुनून था वह ....?


ना भूक थी , ना प्यास थी 
बस आपने आप को निर्माण करने की वह जिद्द थी 
गिरता रहा , 
चलता रहा ,
बस आपने आप को मैं खोजता रहा..
बस , तनहाई मिली...
तनहाई की जीवन रेखा में आशा की किरण सामने आई...
सपना रंगकर्म का लिए निकल पड़ा मैं ...
साबित करने मैं आपने आप को ...
साबित करने इस दुनिया को ...
दौड़ पड़ा मैं अपने आत्मा के साथ ...
विचार ,शरीर और मन की कसौटी लिए ...
अपने जीवन को सार्थक बनाने ...
अपना मुखवटा उतारकर ....
कला के साधना की और ...
आज उसकी वह गूंज मुझे वापस सुनाई देने लगीं है 
आपने वजूद के साथ !
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रंगकर्मी
तुषार म्हस्के
tmhaske09@gmail.com
9029333147

Thursday, 13 April 2017

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस :- “राजनीति’ विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव -3

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस
“राजनीति’
‘खेती, किसान,आत्महत्या और डिजिटल इंडिया’
‘अपनी ही ‘खोपड़ी’ लिए खड़ा भारतीय ‘किसान’ और महान भारत का ‘जनमानस’ खामोश क्यों?’
विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव -3
उत्प्रेरक – रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज
कब : 23 - 27 अप्रैल,2017
कहाँ : युसूफ मेहरअली सेंटर , पनवेल ( मुंबई)
सहभागी : वो सभी देशवासी जो स्वयं को लोकतंत्र का पैरोकार और रखवाले समझते और मानते हैं


विवरण :-
हमारा जीवन हर पल ‘राजनीति’ से प्रभावित और संचालित होता है पर एक ‘सभ्य’ नागरिक होने के नाते हम केवल अपने ‘मत का दान’ कर अपनी राजनैतिक भूमिका से मुक्त हो जाते हैं और हर पल ‘राजनीति’ को कोसते हैं ...और अपना ‘मानस’ बना बैठे हैं की राजनीति ‘गंदी’ है ..कीचड़ है ...हम सभ्य हैं ‘राजनीति हमारा कार्य नहीं है ... जब जनता ईमानदार हो तो उस देश की लोकतान्त्रिक ‘राजनैतिक’ व्यवस्था कैसे भ्रष्ट हो सकती है ? .... आओ अब ज़रा सोचें की क्या बिना ‘राजनैतिक’ प्रकिया के विश्व का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ चल सकता है ... नहीं चल सकता ... और जब ‘सभ्य’ नागरिक उसे नहीं चलायेंगें तो ... बूरे लोग सत्ता पर काबिज़ हो जायेगें ...और वही हो रहा है ... आओ ‘एक पल विचार करें ... की क्या वाकई राजनीति ‘गंदी’ है ..या हम उसमें सहभाग नहीं लेकर उसे ‘गंदा’ बना रहे हैं ... 23 - 27 अप्रैल,2017 को “राजनीति’ विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव 3 का आयोजन कर हमने एक सकारात्मक पहल की है .रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज की उत्प्रेरणा में सभी सहभागी उपरोक्त प्रश्नों पर मंथन करेगें . हम सब अपेक्षा करते हैं की ‘गांधी , भगत सिंह , सावित्री और लक्ष्मी बाई’ इस देश में पैदा तो हों पर मेरे घर में नहीं ... ‘खेती, किसान,आत्महत्या और डिजिटल इंडिया’

‘अपनी ही ‘खोपड़ी’ लिए खड़ा भारतीय ‘किसान’ और महान भारत का ‘जनमानस’ खामोश क्यों?... आओ इस पर मनन करें और ‘राजनैतिक व्यवस्था’ को शुद्ध और सार्थक बनाएं ! आपकी सहभागिता के प्रतीक्षारत !